Friday, February 26, 2010

काँच

कितनी बार सम्पूर्णता को निहारकर देखा 
हाव-भाव से, गंभीरता से 
अक्स को संभलते देखा 
अक्स क्यों सत्य भ्रमित कर देते हैं ?
यह अक्स जितनी बार दिखा पूर्ण दिखा
न विखंडित, न खंडित 
परन्तु एक अप्रमाणित सत्य !!
वही दिखा जो देखना चाहा
पर  आलौकिक नहीं था कुछ भी 
था सिर्फ अनवलोकित सत्य !!
बिखराव  के बाद अनेक अक्सों की शख्सियत से 
कुछ तिकोने, कुछ सिर्फ कोने 
और कुछ में विकृत रंगों के होने से 
उस विभ्रमित सत्य का पहली बार आईना दिखा 
वह दिखा जो कभी नहीं देखना चाहा 
एक संपूर्ण सत्य !!
टूटे हुए व्यक्तित्व की कोई राह नहीं होती 
पर फिर भी टूटन होती है कई बार शुभ 
काँच जो टूटा आज वह रु-ब-रु था
काँच का टूटना माना फिर क्यों जाता है शुभ ?
                                            ----प्रज्ञा 


[This image is solely an act of insanity - by me , so its obviously under copyright :) ]

4 comments:

bindaasviti said...

this is amazing pragya! keep up the good work!

Pragya Modi said...

thanks so much Vitasta for your kind words :D

Vivek Singh said...

आपकी कांच कविता पढ़ी बहुत ही अच्छी है , व्यक्तित्व के कई आयाम है और कांच उन्हें देखने का सबसे बढ़िया माध्यम

Pragya Modi said...

@Vivek thanks!! :D